उच्च न्यायालय: पति को रात में बिस्तर पर मना नहीं कर सकती पत्नी,कोर्ट ने माना क्रूरता,दिया ये आदेश

उच्च न्यायालय: पति को रात में बिस्तर पर मना नहीं कर सकती पत्नी,कोर्ट ने माना क्रूरता,दिया ये आदेश

दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति की तलाक याचिका को मंजूर करते हुए कहा कि पत्नी द्वारा बिना वजह पति को दांपत्य सुख से वंचित रखना क्रूरता है।

पत्नी एक दशक तक पति से अलग रहने की वजह बताने में असफल रही है।

उसके दहेज प्रताड़ना के आरोप भी साबित नहीं हुए हैं। कानून की नजर में यह पति के साथ मानसिक प्रताड़ना है। न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने पति को सार्वजनिक तौर पर नपुंसक कहने को भी क्रूरता माना है। पीठ ने कहा कि इस दंपती की मेडिकल रिपोर्ट से स्पष्ट है कि दोनों यौन संबंध बनाने में सक्षम हैं। यहां मुद्दा वैवाहिक संबंधों से बच्चे का जन्म ना होने को लेकर है। यदि किसी वजह से पत्नी गर्भ धारण नहीं कर पा रही है तो इसे नपुंसकता नहीं कहा जा सकता। इस तरह पति को बदनाम करना उसके मानसिक स्वास्थ्य से खिलवाड़ है, जोकि क्रूरता की श्रेणी में आता है।

दो बार आईवीएफ कराया, असफल रहा सुनवाई की दौरान पीठ ने पाया कि दंपती ने दो बार विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) उपचार कराया, लेकिन यह असफल रहा। पीठ ने कहा कि यह दंपती शादी के बाद महज दो साल तीन महीने साथ रहा। इस बीच दो बार आईवीएफ की प्रक्रिया से गुजरा। इससे साफ है कि दंपती जल्द बच्चा चाहते थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इनमें से कोई एक बच्चे के जन्म के लिए सक्षम नहीं था। डॉक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ कमियां थीं, लेकिन इसमें पति की नपुंसकता जैसी कोई बात नहीं थी

दहेज प्रताड़ना का आरोप साबित नहीं हो सका

पत्नी ने वर्ष 2014 में पति और ससुरालवालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा दर्ज कराया था। हालांकि, इससे पहले ही उसका पति फैमिली कोर्ट में तलाक याचिका दायर कर चुका था। पीठ ने माना कि दहेज का मुकदमा तलाक याचिका का काउंटर हमला था, क्योंकि पत्नी ने उच्च न्यायालय में अपने बयानों में माना कि दो बार आईवीएफ प्रक्रिया का सारा खर्च पति ने उठाया, जोकि करीब तीन लाख रुपये था। इसके अलावा कई बार बीमार पड़ने और एक बार सर्जरी का खर्च भी पति ने ही उठाया था। पति उसके तमाम खर्च उठा रहा था। ऐसे में पीठ ने माना कि जो व्यक्ति पत्नी के उपचार पर लाखों रुपये खर्च कर सकता है। वह पत्नी को और दहेज लाने के लिए प्रताड़ित करे यह समझ से परे है। पत्नी प्रताड़ना का समय और तरीका बताने में भी नाकामयाब रही है।

तलाक की याचिका मंजूर

दंपती की शादी 3 जुलाई 2011 को हुई थी। दो साल तीन महीने साथ रहने के बाद पत्नी 16 अक्तूबर 2013 को ससुराल छोड़कर मायके चली गई थी। इसके बाद वह कभी लौटकर नहीं आई। पीठ ने माना कि पत्नी के पास पति से अलग रहने की कोई ठोस वजह नहीं थी। पत्नी के इस व्यवहार के कारण पति को दस साल तक दांपत्य सुख से वंचित रहना पड़ा। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2021 में पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया था। अब उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पति की याचिका को मंजूर कर लिया है। साभार डीबी।

सांकेतिक चित्र 

रिपोर्ट:अमित कुमार सिंह
एडिटर इन चीफ(परमार टाईम्स)
parmartimes@gmail.com

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